पालमपुर, जिला कांगड़ा २०१० - २०२२
- Anurag Sharma
- Oct 12, 2022
- 3 min read
शहर छूट गया, दोस्त रह गए और उन गलियों में बिताया हुआ हर दिन एक गत्ते के डिब्बे में बंद कर अपने साथ ले आया हूं । 2010 में जब पहली बार पालमपुर गया था तो सोचा था, बस 5 साल और फिर यहां से निकल कर और दुनिया देखूंगा। जिंदगी के कई मौसम देखे वहां, कुछ दोस्त बनाए, जो थे वह छूट गए और एक वक्त गुजरता गया। पीछे मुड़ कर देखता हूं तो वह बिन मतलब की दोस्ती ही नज़र आती है। पालमपुर मेरे लिए दोस्ती का शहर था, प्यार का, घर का और अपनेपन का। सब कहते हैं कि पालमपुर बहुत याद आता है जाने के बाद, पर मुझे वो जगह नहीं, वह घर याद आता है जो मैंने दोस्ती से बनाया था । कुछ अपने साथ पढ़ने वाले दोस्त थे, कुछ अपने से बड़े, कुछ मुझसे बहुत ही छोटे...लेकिन दोस्त थे ।

इन सब के बीच जो एक अहम दोस्त है, उसका नाम अक्षय है । अक्षय पालमपुर का रहने वाला था, कॉलेज के शुरुआती दिनों...या यूं कहूं कि कुछ सालों में शायद कभी बात ही नही की थी। मैं दोस्ती की कहानी नही सुना रहा, घर की सुना रहा हूं। जब दोस्ती हुई तो घर आना जाना शुरू हुआ। पहले झिझकता था, फिर थोड़ा कंफर्टेबल हुआ तो आना जाना और बढ़ गया। अक्सर जब हॉस्टल में खाने का मन नहीं करता था तो अक्षय को फोन कर कहता था कि आज घर पे मेरे लिए भी खाने को बोल देना। कुछ साल इधर उधर नौकरी करने पर, उसके घर आना जाना कम हो गया। लेकिन किस्मत एक बार फिर जब 2019 में वापिस पालमपुर लेकर वापिस गई तो इस बार वो नयापन नहीं था। सब लोग अपने ही थे, और सब अपना अपना सा था। जिंदगी की कठिनाइयो के बीच यह दोस्ती ही थी जो मुझे संभाल कर रखती थी । लेकिन बात घर की है, जो मेरा नहीं था पर अब मेरा था... और हां अक्षय को भी कहा है, की जब एक और घर बनाए तो अलग से एक कमरा मेरे लिए भी बना देना। पालमपुर के कुछ आखिरी दिनों में, अक्षय के ऑफिस में बैठ कर, एक घर का नक्शा भी उसे दे आया हूं, ताकि मेरे रहने का कमरा रह न जाए। पिछले कुछ सालों में अब मैं अक्षय को फोन नहीं करता था, आंटी को करता था, और कभी कभी तो खुद ही घर पहुंचता था, खाना भी बनाता था, खाता भी था और सो भी वहीं जाता था। अब वह झिझक नहीं थी, सिर्फ अपनापन था। जिस दिन वह शहर छोड़ कर आया, आंटी ने 10 बार कहा, "अपना ध्यान रखना", आंखें उनकी नम थी, मेरी भी, पर मैने छुपा लिया, वो नहीं छुपा पाए।
पालमपुर एक जाना माना नाम है, अनेक गलियां हैं, कैफे हैं और हर जरूरी चीज़ वहां मिल जाती है, शायद किसी भी शहर में मिल जाती है, पर जो नही मिलता वो है घर। घर जहां अपनापन लगे, प्यार मिले और जज़्बात बिखर जाएं।अपने वक्त का एक एहम हिस्सा मैने उस घर में बिताया है, अब लाहौल में हूं। दूर जरूर हूं पर अकेला नहीं...अभी अभी आंटी से फोन पर बात कर हटा हूं, सब ठीक लग रहा है। जल्द ही पालमपुर जाऊंगा, दोस्ती और घर की दीवारों को और पक्का करने, मुझे यकीन है की अक्षय ये ब्लॉग जरूर पढ़ेगा। पढ़ने के बाद आंटी को जरूर सुना देना पढ़कर, मैं जल्दी वापिस आऊंगा, भाभरी वाले दही भल्ले खाने, परांठे खाने और आपके किचन में काम करके अक्षय को गालियां खिलवाने।
लाहौल: 12.10.2022
Kuch lines meri tarf se bhi Sir G .😎
दस्तूर है जमाने का यह पुराना, लगा रहता है यहां आना और जाना, रहो जहां अपनी छाप ऐसे छोड़ जाना, हर कोई गुनगुनाता रहे आपका ही तराना।
Lovely reading your article Palampur 2020-2022. It actually took me to the memory lane. You make friends and then separate to meet again. Life goes on. Good writing. I wish you write more at the new place of posting that gives you a creative environment.